Thursday, April 2, 2026

“वो लड़का…”


वो लड़का जो हंसता बहुत है,
अंदर से थोड़ा टूटा होता है,
दुनिया को मजबूत दिखाने में,
खुद से ही रोज़ रूठा होता है।

घर की उम्मीदों का बोझ लिए,
ख्वाबों को जेब में रखता है,
अपनों की खुशियों के खातिर,
अपने अरमानों को दबाता है।

ना रो सकता खुलकर कभी,
ना दर्द किसी को दिखाता है,
“सब ठीक है” कहकर हर बार,
दिल का हाल छुपाता है।

सुबह निकलता है जिम्मेदारियों संग,
रात को थककर सो जाता है,
कोई पूछे “कैसा है?” अगर,
मुस्कुराकर बस “ठीक हूँ” कह जाता है।

गिरता है, टूटता है, फिर भी,
हर रोज़ खड़ा हो जाता है,
क्योंकि वो जानता है —
उसे ही घर का सहारा बनना है।

उसके सपनों की कोई आवाज़ नहीं,
पर हौसलों में तूफान छुपा है,
वो लड़का चुप जरूर है,

पर उसके अंदर एक पूरा आसमान बसा है। 


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वो लड़का जो हंसता बहुत है, अंदर से थोड़ा टूटा होता है, दुनिया को मजबूत दिखाने में, खुद से ही रोज़ रूठा होता है। घर की उम्मीदों का बोझ ल...